उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग ने निःशुल्क स्वास्थ्य जाचों में की कटौती
देहरादून। प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाओं के हालात किसी से छुपे नहीं हैं। अब सरकार ने एक कदम आगे बढ़ाकर पीएचसी और सीएससी स्तर पर जनता को मिलने वाली निःशुल्क स्वास्थ्य जांचों में कटौती कर दी है। पीएचसी और सीएससी स्तर पर बी- 12 और डी- 3 समेत अन्य निःशुल्क जांचों को बंद कर दिया गया है। वर्तमान समय में हर एक दूसरे व्यक्ति में बी- 12 और डी- 3 की कमी पाई जा रही है। दरअसल, उत्तराखंड सरकार ने प्रदेश की जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराए जाने को लेकर साल 2021 में निःशुल्क स्वास्थ्य जांच योजना शुरू की थी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 12 अगस्त 2021 को इस निःशुल्क स्वास्थ्य जांच योजना का शुभारंभ किया था। उस दौरान इस योजना को पहले चरण में प्रदेश के 254 चिकित्सालयों में शुरू किया गया। साथ ही योजना में तहत जनता को निःशुल्क 208 जांचों की सुविधा दी गई। एनएचएम के जरिए पीपीपी मोड पर संचालित इस योजना का लाभ जनता को जिला अस्पताल, उप जिला अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में मिल रही है। इसके बाद इस योजना को विस्तार देते हुए जांचों की संख्या की 208 से बढ़ाकर 266 कर दिया गया।
इस योजना के तहत बायोकेमिस्ट्री, हेमेटोलाजी, विटामिन, हार्मोन, बायोप्सी, इम्युनोलाजी व ट्यूमर मार्कर से संबंधित 266 जांचें शामिल हैं। जब इस योजना की शुरुआत की गई उस दौरान राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत चंदन हेल्थकेयर के साथ पीपीपी मोड पर संचालित करने का निर्णय लिया गया, जो अभी भी प्रदेश भर में इस योजना के तहत निःशुल्क स्वास्थ्य जांच की सुविधाएं प्रदान कर रही है। इस दौरान जांच सुविधाओं के लिए इस निजी कंपनी के कार्यकाल को कई बार बढ़ाया गया। ऐसे में अब 31 मई को एक बार फिर इस कंपनी का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है। उससे पहले ही प्रदेश के सीएचसी और पीएचसी पर मिलने वाली निःशुल्क बी- 12 और डी- 3 जांच को बंद कर दिया गया है। जिला और उप जिला अस्पताल पर इन जांच की सुविधाएं उपलब्ध हैं।
ऐसे में एक बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि पीएचसी और सीएससी स्तर पर मिलने वाली निःशुल्क बी- 12 और डी- 3 जैसी महत्वपूर्ण जांचों को आखिर क्यों बंद कर दिया गया? जबकि वर्तमान स्थिति यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग सामान्य बीमारी के इलाज के लिए सीएससी और पीएचसी ही पहुंचाते हैं। इसके अलावा, बी- 12 और डी- 3 विटामिन की कमी आज के इस दौर में लगभग हर दूसरे व्यक्ति में देखा जा रहा है। ऐसे में इस जांच के लिए जनता को या तो जिला अस्पताल या उप जिला अस्पताल की ओर रुख करना पड़ता है, नहीं तो निजी पैथोलॉजी लैब में जांच करनी पड़ती है। जिसके कीमत 700 से 1500 रुपये तक होती है। यह कीमत गरीब जनता पर अतिरिक्त भार है।
शरीर में विटामिन बी-12 की कमी से थकान और कमजोरी महसूस होने के साथ ही हाथों और पैरों में सुन्नपन या झनझनाहट, त्वचा का पीला पड़ जाना, मुंह में छाले का होना शामिल है। इसके अलावा, याददाश्त कमजोर होना, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं। इसी तरह, शरीर में विटामिन डी-3 की कमी होने से पीठ दर्द, जोड़ों में लगातार दर्द, मांसपेशियों में दर्द, मांसपेशियों में ऐंठन, बार-बार बीमार पड़ना, सामान्य से अधिक बाल गिरना के साथ ही डिप्रेशन या बहुत अधिक उदासी महसूस होने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
डॉ रवींद्र राणा ने कहा विटामिन बी- 12 और डी- 3 की मात्रा शरीर में पर्याप्त होना बहुत जरूरी है। इसकी कमी से तमाम समस्याएं होती हैं। इन दोनों विटामिन की कमी आमतौर पर लगभग हर किसी में देखी जा रही है। ऐसे में इसकी जानकारी का पता लगाए जाने को लेकर सबसे पहले ब्लड टेस्ट करवाना पड़ता है। इसके बाद फिर दवाइयों का कोर्स शुरू किया जाता है। इसके अलावा खान-पान के जरिए भी इसकी कमी को पूरा किया जा सकता है। इसकी कमी मांस, अंडा, दूध और दूध के उत्पाद से दूर होती है। आजकल अधिकतर मरीजों में विटामिन बी- 12 और डी- 3 की कमी पाई जा रही है। इन दोनों विटामिन की कमी का एक सबसे बड़ा कारण इनएक्टिंवनेस भी है।
सीएससी और पीएचसी स्तर पर विटामिन बी-12 और विटामिन डी- 3 की जांचे बंद होने का सवाल स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल से किया गया है। उन्होंने कहा व्यवस्थाएं गड़बड़ा जाती हैं तो उसे सुधारा भी जाता है। ऐसे में इन व्यवस्थाओं को सुधारने का काम किया जा रहा है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन निदेशक डॉ रश्मि पंत ने कहा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत निशुल्क स्वास्थ्य जांच की सुविधा जनता को दी जा रही है। ऐसे में जनता को मिलने वाली निःशुल्क जांचों पर निगरानी बढ़ाए जाने पर जोर दिया जा रहा है। जिसे किसी भी मरीज को निजी लैब में जाकर जांच कराने की आवश्यकता ना पड़े। उन्होंने कहा मॉनिटरिंग इनफॉरमेशन सिस्टम को भी मजबूत किया जा रहा है। वर्तमान समय में हेल्थ मैनेजमेंट इन्फोर्मेशन सिस्टम के जरिए ओपीडी और आईपीडी में आने वाले मरीजों की जानकारी रखी जा रही है।



