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वीर भड़ माधो सिंह भण्डारी को जो सम्मान मिलना चाहिए था वह नहीं मिल पाया

देहरादून। उत्तराखण्ड की पुण्यभूमि गढ़वाल ने सदियों से ऐसे वीर सपूतों को जन्म दिया है, जिन्होंने धर्म, संस्कृति, समाज और सीमाओं की रक्षा हेतु अपने प्राणों का बलिदान दिया। इन्हीं में एक नाम हैकृवीर शिरोमणि भड़ माधोसिंह भण्डारी, जो 16वीं शताब्दी में श्रीनगर गढ़वाल राज्य के प्रधान सेनाध्यक्ष रहे। वीर भड़ माधोसिंह भण्डारी न केवल एक अपराजेय योद्धा थे, बल्कि वे अपने समय के दूरदर्शी प्रशासक, समाजसेवी और विलक्षण अभियंता भी थे। उन्होंने मुगल, तिब्बती एवं सीमांत आक्रमणकारियों से गढ़राज्य और भारतवर्ष की उत्तरी सीमाओं की रक्षा की। मालूण किले की विजय, दापा घाटी के युद्ध और गढ़वाल की सीमाओं का सिरमौर से सतलज तक विस्तारकृउनके पराक्रम के ऐतिहासिक प्रमाण हैं।
युद्ध के साथ-साथ उन्होंने जनकल्याण हेतु नहरों (कूल), सुरंगों (छैंणा), पुलों और जल संरचनाओं का निर्माण कराया। मलेथा की ऐतिहासिक सुरंग आज भी उनके अद्भुत साहस, तकनीकी दक्षता और सामाजिक उत्तरदायित्व की जीवित मिसाल है। लोककथाओं में वर्णित उनके पुत्र वीरसिंह का बलिदान, राष्ट्र और समाज के प्रति उनके सर्वोच्च समर्पण को दर्शाता है। वीर शिरोमणि भड़ माधोसिंह भण्डारी के वंशज ग्राम सरूणा, टिहरी गढ़वाल निवासी वीरेन्द्र सिंह भण्डारी का  कहना है कि इतना विशाल योगदान होने के बावजूद यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज तक न तो उनके नाम पर कोई राष्ट्रीय स्मारक है, न पाठ्यक्रमों में समुचित स्थान और न ही राजकीय सम्मान। गढ़भूमि की जनता एवं उनके वंशज भारत सरकार और उत्तराखण्ड राज्य सरकार से यह मांग करते हैं कि वीर भड़ माधो सिंह भण्डारी को राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय ऐतिहासिक नायक का दर्जा दिया जाए, उनके नाम पर स्मारक, प्रतिमा या स्मृति चौक स्थापित किया जाए, उनके जीवन और योगदान को शैक्षिक पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाए। यह केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड और भारत के गौरवशाली इतिहास का प्रश्न है।

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