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बर्थ सर्टिफिकेट के बदले नियम, देरी पर कोर्ट के लगाने पड़ेंगे चक्कर
देहरादून। बच्चों के जन्म के बाद बर्थ सर्टिफिकेट (जन्म प्रमाणपत्र) एक महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। जिसके जरिए तमाम डॉक्यूमेंट बनाने या फिर स्कूल में दाखिला दिलाने के दौरान इसकी जरूरत होती है। लेकिन वर्तमान में प्रदेश के अस्पतालों में बर्थ सर्टिफिकेट बनाने में काफी देरी देखी जा रही है। जबकि नियमानुसार, बच्चा पैदा होने के 7 दिन के भीतर बर्थ सर्टिफिकेट बनाना अनिवार्य है। हालांकि, समय के साथ ही इसमें तमाम बदलाव भी हुए। ऐसे में भारत सरकार के स्तर से भी बड़े बदलाव होने जा रहे हैं। लेकिन उससे पहले ही उत्तराखंड में बर्थ सर्टिफिकेट बनाने वाले की संख्या में काफी अधिक इजाफा देखा जा रहा है।
जन्म प्रमाण पत्र किसी भी बच्चे के जन्म का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। जिसके आधार पर ही आधार कार्ड से लेकर कई महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार किए जाते हैं, और उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर स्कूल में दाखिला मिलता है। साल 2023 में भारत सरकार ने जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण एक्ट में संशोधन किया था। जिसके बाद जन्मतिथि का एकमात्र डॉक्यूमेंट जन्म प्रमाण पत्र बन गया है। जिसके बाद से जन्म प्रमाणपत्र का महत्व और अधिक बढ़ गया है। यही नहीं, साल 2023 में संशोधन के साथ ही जन्म और मृत्यु पंजीकरण व्यवस्था को ऑनलाइन के साथ ही नेशनल स्तर पर भी कर दिया है। भारत सरकार ने एक बार फिर इस एक्ट में बड़ा संशोधन किया है। हालांकि, ये व्यवस्था अभी लागू नहीं हुई है, लेकिन जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा में 31 जुलाई 2026 को पारित हो गया है। जिसमें भारत सरकार ने जन्म और मृत्यु पंजीकरण में देरी करने संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान किए हैं। वर्तमान समय में बच्चे के जन्म के बाद 21 दिन के भीतर अगर बर्थ सर्टिफिकेट बनवा रहे हैं तो बेहद ही सरल प्रक्रिया से जन्म प्रमाण पत्र बन जाएगा। ऐसे में भारत सरकार की ऑफिशल वेबसाइट सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के जरिए जन्म और मृत्यु का प्रमाण पत्र जारी किया जा रहा है। लेकिन भारत सरकार के संशोधन के बाद अब जन्म प्रमाण पत्र बनाना और भी जटिल हो जाएगा। फिर एक से 2 साल की देरी की जाती है तो फिर जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए जिला मजिस्ट्रेट व एसडीएम या अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अनुमति लेना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही अगर 2 साल से अधिक की देरी होती है तो जन्म प्रमाण पत्र, प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही बन पाएगा। सरकार जन्म और मृत्यु के पंजीयन की व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने जा रही है और ये विधेयक उसी के तहत लाया गया है। सरकार जन्म और मृत्यु से जुड़े रिकॉर्ड को डिजिटल और व्यवस्थित बनाने के साथ फर्जी दस्तावेजों पर लगाम लगाने की तैयारी में है। नया कानून लागू होने के बाद जन्म प्रमाण पत्र को दूसरे अहम सरकारी सेवाओं और प्रक्रियाओं के लिए प्रमुख दस्तावेज के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकेगा। नए कानून के लागू होने के बाद जन्म प्रमाण पत्र भारतवासी के जीवन का सबसे जरूरी दस्तावेज बन जाएगा। इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद एक साल के भीतर जन्म और मृत्यु का रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी हो जाएगा। उत्तराखंड की बात करें तो उत्तराखंड में भी भारत सरकार की ओर से साल 2023 में किए गए संशोधन के बाद नई व्यवस्था लागू हो गई थी। जिसके तहत प्रदेश में भारत सरकार की सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के जरिए ही जन्म या मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किए जा रहे हैं। लेकिन प्रदेश के खासकर सरकारी अस्पतालों में कई बार जन्म प्रमाण पत्र समय पर न जारी होने के मामले सामने आ चुके हैं। जिस कारण अभिभावकों को अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। हालांकि, इस पूरे मामले पर स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि कई बार तकनीकी खामियों या फिर अत्यधिक कामों की व्यवस्था के चलते सर्टिफिकेट जारी करने में देरी हो जाती है, लेकिन विभाग की कोशिश यही है, इस समय पर सर्टिफिकेट जारी किए जाए।



