देहरादून में आर्यिका पूर्णमति माताजी का चातुर्मास, समवशरण विधान में उमड़ रही श्रद्धालुओं की भीड़

देहरादून। देवभूमि देहरादून में आर्यिका रत्न 105 पूर्णमति माताजी का ससंघ मंगल चातुर्मास श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ चल रहा है। चातुर्मास के अंतर्गत प्रतिदिन धार्मिक अनुष्ठान, पूजन-अर्चना और आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। समवशरण विधान में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर धर्माराधना और पुण्यार्जन कर रहे हैं। संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर महाराज एवं नवाचार्य समयसागर महाराज की परम प्रभावक शिष्या आर्यिका पूर्णमति माताजी के मंगल सानिध्य में मध्य प्रदेश के विधानाचार्य दीपक जैन शास्त्री विभिन्न धार्मिक विधान विधि-विधान से संपन्न करा रहे हैं। समवशरण विधान के माध्यम से श्रद्धालु तीर्थंकर भगवान की दिव्य धर्मसभा का स्मरण करते हुए आत्मिक शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की भावना के साथ पूजन-अर्चना कर रहे हैं।
समवशरण तीर्थंकर भगवान की दिव्य धर्मसभा
आर्यिका पूर्णमति माताजी ने समवशरण के आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जैन धर्म में समवशरण तीर्थंकर भगवान की उस दिव्य धर्मसभा को कहा जाता है, जहां केवलज्ञान प्राप्त होने के पश्चात भगवान की दिव्यध्वनि के माध्यम से समस्त जीवों के कल्याण के लिए धर्मोपदेश दिया जाता है।
माताजी ने बताया कि समवशरण के चारों द्वारों के बाहर भव्य मानस्तंभ होते हैं। इनके दर्शन से व्यक्ति के मन में अहंकार और मान का त्याग करने की प्रेरणा जागृत होती है। समवशरण में आठ भूमियों का वर्णन मिलता है, जिनमें चैत्य प्रासाद भूमि, जल खातिका भूमि, लतावन भूमि, उपवन भूमि, ध्वज भूमि, कल्पवृक्ष भूमि, भवन भूमि तथा श्रीमंडप भूमि शामिल हैं। श्रीमंडप भूमि में गंधकुटी के चारों ओर बारह सभाओं की व्यवस्था होती है। यहां मुनिराज, आर्यिकाएं, देव-देवियां, मनुष्य और तिर्यंच जीव अपने-अपने निर्धारित स्थान पर बैठकर तीर्थंकर भगवान की दिव्यध्वनि का लाभ प्राप्त करते हैं। श्रीमंडप के मध्य स्थित गंधकुटी में सिंहासन पर तीर्थंकर भगवान अष्ट प्रातिहार्यों सहित विराजमान होते हैं।
समवशरण विधान से आत्मिक शुद्धि का संदेश
समवशरण विधान जैन समाज का विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठान है। इसमें समवशरण की दिव्य संरचना, आठ भूमियों, मानस्तंभ, चैत्य प्रासाद और बारह सभाओं के प्रतीकात्मक स्वरूप की स्थापना कर पूजन-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु इस विधान के माध्यम से तीर्थंकर भगवान के समवशरण का भावपूर्ण स्मरण करते हुए आत्मिक शुद्धि, पुण्यार्जन और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लेते हैं।
आचार्य विद्यासागर महाराज की चरण पादुकाओं का शुद्धिकरण
चातुर्मास के धार्मिक आयोजनों की कड़ी में संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर महाराज की पावन चरण पादुकाओं का शुद्धिकरण भी किया गया। संत निवास स्थित भद्रबाहु गुफा में आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ धर्माराधना कर पुण्य लाभ प्राप्त किया।
देश-विदेश से पहुंच रहे श्रद्धालु
मीडिया समन्वयक मधु जैन ने बताया कि आर्यिका पूर्णमति माताजी के मंगल चातुर्मास और समवशरण विधान का लाभ लेने के लिए देहरादून के साथ ही देश के विभिन्न शहरों और विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। श्रद्धालु माताजी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करने के साथ सेवा, पूजन, शंका समाधान और महाआरती में भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम में सकल दिगंबर जैन समाज, देहरादून, श्री विद्या समय पूर्ण वर्षायोग समिति-2026, जैन भवन कार्यकारिणी के पदाधिकारी एवं सदस्य तथा विभिन्न धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। चातुर्मास के आयोजनों से देहरादून का वातावरण भक्तिमय बना हुआ है।



